स़लातुर् रग़ाइब) नफ़्ल नमाज़ जमाअ़त से पढ़ना कैसा

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*🥀 (स़लातुर् रग़ाइब) नफ़्ल नमाज़ जमाअ़त से पढ़ना कैसा 🥀*



* इमामे अहले सुन्नत और हुज़ूर स़दरुश् शरीअ़ह رضی الله عنہما के फ़रमान के मुत़ाबिक़ नफ़्ल नमाज़ में इमाम के साथ 3 मुक़्तदियों तक इजाज़त है, जबकि 4 या उस से ज़्यादह अफ़राद के साथ जमाअ़त करने को फ़िक़्हे ह़नफ़ी में मक़रूह़े तन्ज़ीही (ख़िलाफ़े औला) कहा गया है, गुनाह या ह़राम नहीं। मज़ीद येह कि चूँकि इस मस्अले में अहले इ़ल्म का इख़्तिलाफ़ मौजूद है और बहुत से अकाबिरे दीन से नफ़्ल नमाज़ की जमाअ़त साबित है, इसी लिये उ़लमाए उम्मत व ह़ुकमाए मिल्लत ने ऐसी मुमानअ़त से मनअ़् फ़रमाया है।


*ह़ुज़ूर स़दरुश् शरीअ़ह फ़रमाते हैं:*
* स़लातुर् रग़ाइब कि रजब की पहली शबे जुमुअ़ह और शअ़्बान की पंद्रहवीं शब और शबे क़द्र में जमाअ़त के साथ नफ़्ल नमाज़ बअ़्ज़ जगह लोग अदा करते हैं, फ़ुक़हा इसे नाजाइज़ व मकरूह व बिदअ़त कहते हैं और लोग इस बारे में जो ह़दीस बयान करते हैं मुह़द्दिसीन उसे मैज़ूअ़् (बे-अस़्ल, मन-घढ़त) बताते हैं लेकिन अजिल्लए अकाबिर औलिया (बड़े बड़े औलिया) से ब-असानीदे स़ह़ीह़ह मरवी है, तो इस के मनअ़् में ग़ुलू न चाहिए और अगर जमाअ़त में तीन से ज़ाइद मुक़तदी न हों जब तो अस़्लन कोई ह़रज नहीं 
*📚 बहारे शरीअ़त, जिल्द 1, ह़िस़्स़ह 4, पेज 687, मस्अलह 1*

*इमामे अहले सुन्नत फ़रमाते हैं:*
* नफ़्ल ग़ैरे तरावीह़ में इमाम के सिवा तीन आदमियों तक तो इजाज़त ही है - चार की निस्बत कुतुबे ह़नफ़िय्यह में कराहत लिखते हैं यअ़्नी कराहते तन्ज़ीही जिसका ह़ास़िल ख़िलाफ़े औला है न कि गुनाह व ह़राम کما بیناہ فی فتاوٰنا (जैसा कि हमने इसकी तफ़्स़ील अपने फ़तावा में बयान कर दी है) मगर मस्अलह मुख़्तलफ़ फ़ीह है और बहुत अकाबिरे दीन से जमाअ़ते *नवाफ़िल बित्-तदाई़* साबित है और अ़वाम फ़ेअ़्ले ख़ैर से मनअ़् न किए जाएंगे - उ़लमाए उम्मत व ह़ुकमाए मिल्लत ने ऐसी मुमानअ़त से मनअ़् फ़रमाया है 
*📚 फ़तावा रज़विय्यह, जिल्द 7, स़फ़्ह़ह् 465*

* *तदाई़* का लुग़वी मअ़्ना है एक दूसरे को बुलाना - और तदाई़ के साथ जमाअ़त का मत़लब है कि कम अज़ कम चार आदमी एक इमाम की इक़्तिदा करें। 
*📚 फ़तावा रज़विय्यह, जिल्द 7, स़फ़्ह़ह् 430*



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